Puja
Description
जातक की शिक्षा दीक्षा आरंभ करवाने के लिये जो संस्कार किया जाता है उसे उपनयन संस्कार कहा जाता है। चूंकि शिक्षा मनुष्य के जीवन में निरंतर चलने वाली एक प्रक्रिया है जिससे शिक्षार्थी का सर्वांगीण विकास होता है। आरंभ में जातक को जब इस लायक समझा जाता कि अब वह गुरूओं से ज्ञान अर्जित करने में सक्षम है तो उस अवस्था में जातक का उपनयन संस्कार किया जाता था। प्राचीन समय में गुरु शिष्य परंपरा के तहत गुरुओं के पास जातक को रखा जाता था। उपनयन का शाब्दिक अर्थ ही सामीप्य यानि निकटता व उन्नति भी लिया जाता है। शास्त्रों के अनुसार जन्म से सभी शूद्र पैदा होते हैं लेकिन संस्कारों से जातक द्विज होते हैं। उपनयन संस्कार के बिना जातक को द्विज नहीं माना जाता। हालांकि वर्ण व्यवस्था के तहत शूद्र वर्ण व कन्याओं के लिये उपनयन संस्कार वर्जित था इसलिये उनके लिये विवाह संस्कार ही द्विजत्व प्रदान करने वाला संस्कार होता था।
Additional information
| Number of Days | |
|---|---|
| Number of Pandits |
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जातक की शिक्षा दीक्षा आरंभ करवाने के लिये जो संस्कार किया जाता है उसे उपनयन संस्कार कहा जाता है। चूंकि शिक्षा मनुष्य के जीवन में निरंतर चलने वाली एक प्रक्रिया है जिससे शिक्षार्थी का सर्वांगीण विकास होता है। आरंभ में जातक को जब इस लायक समझा जाता कि अब वह गुरूओं से ज्ञान अर्जित करने में सक्षम है तो उस अवस्था में जातक का उपनयन संस्कार किया जाता था। प्राचीन समय में गुरु शिष्य परंपरा के तहत गुरुओं के पास जातक को रखा जाता था। उपनयन का शाब्दिक अर्थ ही सामीप्य यानि निकटता व उन्नति भी लिया जाता है। शास्त्रों के अनुसार जन्म से सभी शूद्र पैदा होते हैं लेकिन संस्कारों से जातक द्विज होते हैं। उपनयन संस्कार के बिना जातक को द्विज नहीं माना जाता। हालांकि वर्ण व्यवस्था के तहत शूद्र वर्ण व कन्याओं के लिये उपनयन संस्कार वर्जित था इसलिये उनके लिये विवाह संस्कार ही द्विजत्व प्रदान करने वाला संस्कार होता था।
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