Karkati Vrat

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Description

सूर्य के कर्क राशि में प्रवेश करने के कारण इसे कर्क संक्रांति कहा जाता है। ये संक्रांति सूर्य देव की दक्षिण यात्रा के प्रारंभ को दर्शाती है जिसे दक्षिणायन भी कहते है। माना जाता है इस दिन सूर्य देव छः माह के लिए निद्रा में चले जाते है। इस दिन भगवान विष्णु के पूजन का खास महत्व होता है। इसे देवशयनी एकादशी के नाम से भी जाना जाता है।

इस दिन विष्णु भगवान सूर्य देव का पूजन किया जाता है। बहुत से भक्त इस दिन उपवास भी रखते है। कर्क संक्रांति के दिन कपडे व खाने की चीजों और विशेषकर तेल के दान का बहुत महत्व होता है। इस संक्रांति को मानसून के प्रारंभ के रूप में भी जाना जाता है। कर्क संक्रांति के साथ शुरू होने वाला दक्षिणायन मकर संक्रांति पर समाप्त होता है जिसके बाद उत्तरायण प्रारंभ होता है। दक्षिणायन के चारों महीनों में भगवान विष्णु का पूजन किया जाता है। इस बीच लोग अपने पितरों की शांति के लिए पूजन अथवा पिंडदान आदि भी करते है।

कर्क संक्रांति को किसी भी शुभ और महत्वपूर्ण नए कार्य के प्रारंभ के लिए शुभ नहीं माना जाता है। माना जाता है इस समय किये जाने वाले कार्यों में देवों का आशीर्वाद नहीं मिलता। कर्क संक्रांति को देवशयनी एकादशी भी कहा जाता है जब चार महीनों के लिए देव शयन करने चले जाते है।

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इस दिन विष्णु भगवान सूर्य देव का पूजन किया जाता है। बहुत से भक्त इस दिन उपवास भी रखते है। कर्क संक्रांति के दिन कपडे व खाने की चीजों और विशेषकर तेल के दान का बहुत महत्व होता है। इस संक्रांति को मानसून के प्रारंभ के रूप में भी जाना जाता है। कर्क संक्रांति के साथ शुरू होने वाला दक्षिणायन मकर संक्रांति पर समाप्त होता है जिसके बाद उत्तरायण प्रारंभ होता है। दक्षिणायन के चारों महीनों में भगवान विष्णु का पूजन किया जाता है। इस बीच लोग अपने पितरों की शांति के लिए पूजन अथवा पिंडदान आदि भी करते है।

कर्क संक्रांति को किसी भी शुभ और महत्वपूर्ण नए कार्य के प्रारंभ के लिए शुभ नहीं माना जाता है। माना जाता है इस समय किये जाने वाले कार्यों में देवों का आशीर्वाद नहीं मिलता। कर्क संक्रांति को देवशयनी एकादशी भी कहा जाता है जब चार महीनों के लिए देव शयन करने चले जाते है।

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