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Vipreet Pratyangira Prayog

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Description

रक्षा व शत्रुनाश में बेजोड़
शत्रु की प्रबल से प्रबलतम तांत्रिक क्रियाओं को वापस लौटने वाली एवं रक्षा करने वाली दिव्य शक्ति है प्रत्यंगिरा। विरोधियों/दुश्मनों के प्रयोग तथा किये-कराये को नाश करने के लिए इस तंत्र का प्रयोग किया जाता है। यह स्वत: सिद्ध है। अत: इसके प्रयोग के लिए इसे पुन: सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। बेहतर परिणाम के लिए इसके प्रयोग से पूर्व एक बार ग्यारह हजार मंत्रों का जप कर लिया जाए तो अच्छा होगा। इस मंत्र से कई कठिन और मारक प्रयोग किए जा सकते हैं लेकिन बिना कुशल गुरु के निर्देश व देखरेख के ऐसा कदापि न करें, अन्यथा भारी नुकसान हो सकता है। इसलिए सामान्य साधक इसका प्रयोग सिर्फ आत्मरक्षा के लिए करें। प्रतिदिन 21 मंत्रों का जप करने से विरोधी कभी आप पर हावी नहीं हो सकेंगे। आइये प्रत्यंगिरा के कुछ मंत्रों को जानें एवं अपनी रूचि अनुसार इनको साधें :

ध्यान
नानारत्नार्चिराक्रान्तं वृक्षाम्भ: स्त्रवर्युतम।
व्याघ्रादिपशुभिर्व्याप्तं सानुयुक्तं गिरीस्मरेत।।
मत्स्यकूर्मादिबीजाढ्यं नवरत्न समान्वितम।
घनच्छायां सकल्लोलम कूपारं विचिन्तयेत।।
ज्वालावलीसमाक्रान्तं जग स्त्री तयमद्भुतम्।
पीतवर्णं महावह्निं संस्मरेच्छत्रुशान्तये।।
त्वरा समुत्थरावौघमलिनं रुद्धभूविदम्।
पवनं संस्मरेद्विश्व जीवनं प्राणरूपत:।।
नदी पर्वत वृक्षादिकालिताग्रास संकुला।
आधारभूता जगतो ध्येया पृथ्वीह मंत्रिणा।।
सूर्यादिग्रह नक्षत्र कालचक्र समन्विताम्।
निर्मलं गगनं ध्यायेत् प्राणिनामाश्रयं पदम।।

माला मंत्र

ॐ ह्रीं नम: कृष्णवाससे शतसहस्त्रहिंसिनि सहस्त्रवदने महाबलेअपराजितो प्रत्यंगिरे परसैन्य परकर्म विध्वंसिनि परमंत्रोत्सादिनि सर्वभूतदमनि सर्वदेवान् वंध बंध सर्वविद्यां छिन्दि छिन्दि क्षोभय क्षोमय परयंत्राणि स्फोटय स्फोटय सर्वश्रृंखलान् त्रोटय त्रोटय ज्वल ज्वालाजिह्वे करालवदने प्रत्यंगिरे ह्रीं नम:।

विनियोग
अस्य मंत्रस्य ब्रह्मा ऋषि अनुष्टप् छंद: देवीप्रत्यंगिरा देवता ॐ बीजं, ह्रीं शक्तिं, कृत्यानाशने जपे विनियोग:ढ्ढ

ध्यान
सिंहारुढातिकृष्णांगी ज्वालावक्त्रा भयंकरराम।
शूलखड्गकरां वस्त्रे दधतीं नूतने भजे।।
अन्य मंत्र
1-ॐ ह्रीं कृष्णवाससे नारसिंहवदे महाभैरवि ज्वल-ज्वल विद्युज्जवल ज्वालाजिह्वे करालवदने प्रत्यंगिरे क्ष्म्रीं क्ष्म्यैम् नमो नारायणाय घ्रिणु: सूर्यादित्यों सहस्त्रार हुं फट्।

2-ॐ ह्रीं यां कल्ययन्ति नोस्रय: क्रूरां कृत्यां वधूमिव तां ब्रह्मणास्पानिर्नुद्म प्रत्यक्कर्त्तारमिच्छतु ह्रीं ॐ

ध्यान
खड्गचर्मधरां कृष्णाम मुक्तकेशीं विवाससम्।
दंष्ट्राकरालवदनां भीषाभां सर्वभूषणाम्।
ग्रसन्तीं वैरिणं ध्यायेत् प्रेरीतां शिवतेजसा।।

विपरीत प्रत्यंगिरा
शत्रु द्वारा बारम्बार तन्त्र क्रियाओं के किये जाने पर शत्रु यदि रुकने की बजाए और गहरे तन्त्र आघात देने लगें, प्राण हरण पर ही उतर आएँ अर्थात मानव संवेदनाओं की सीमा को लाँघ कर घिनौनी हरकतों पर उतर आएँ तो उसकी क्रिया को उस पर वापस इस तरह से लौटना की शत्रु को आपके दर्द का एहसास हो इसे विपरीत प्रत्यंगिरा कहा जाता है ढ्ढ प्रत्यंगिरा और विपरीत प्रत्यंगिरा में ये भेद है की प्रत्यंगिरा शक्ति तो सिर्फ वापस लौटती है किन्तु विपरीत प्रत्यंगिरा शत्रु को ही वापस चोट पहुंचाती है और खुद की निश्चित रूप से रक्षा करती है। इस प्रयोग के बाद शत्रु आप पर दोबारा यह प्रयोग कभी नहीं कर सकता। उसकी वह शक्ति खत्म हो जाती है।

मंत्र
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं प्रत्यंगिरे मां रक्ष रक्ष मम शत्रून् भंजय भंजय फें हुं फट् स्वाहा।

विनियोग :
अस्य श्री विपरीत प्रत्यंगिरा मंत्रस्य भैरव ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, श्री विपरीत प्रत्यंगिरा देवता ममाभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोग:।

मालामंत्र
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ कुं कुं कुं मां सां खां पां लां क्षां ॐ ह्रीं ह्रीं ॐ ॐ ह्रीं बां धां मां सां रक्षां कुरु ढ्ढ ॐ ह्रीं ह्रीं ॐ स: हुं ॐ क्षौं वां लां धां मां सा रक्षां कुरु ढ्ढ ॐ ॐ हुं प्लुं रक्षा कुरु ढ्ढ ॐ नमो विपरीतप्रत्यंगिरायै विद्याराज्ञी त्रैलोक्य वंशकरि तुष्टिपुष्टिकरि सर्वपीड़ापहारिणि सर्वापन्नाशिनि सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिनि मोदिनि सर्वशस्त्राणां भेदिनि क्षोभिणि तथा ढ्ढ परमंत्र तंत्र यंत्र विषचूर्ण सर्वप्रयोगादीन् अन्येषां निवर्तयित्वा यत्कृतं तन्मेस्स्तु कपालिनि सर्वहिंसा मा कारयति अनुमोदयति मनसा वाचा कर्मणा ये देवासुर राक्षसास्तिर्यग्योनि सर्वहिंसका विरुपकं कुर्वन्ति मम मंत्र तंत्र यन्त्र विषचूर्ण सर्वप्रयोगादीनात्म हस्तेन।

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ध्यान
नानारत्नार्चिराक्रान्तं वृक्षाम्भ: स्त्रवर्युतम।
व्याघ्रादिपशुभिर्व्याप्तं सानुयुक्तं गिरीस्मरेत।।
मत्स्यकूर्मादिबीजाढ्यं नवरत्न समान्वितम।
घनच्छायां सकल्लोलम कूपारं विचिन्तयेत।।
ज्वालावलीसमाक्रान्तं जग स्त्री तयमद्भुतम्।
पीतवर्णं महावह्निं संस्मरेच्छत्रुशान्तये।।
त्वरा समुत्थरावौघमलिनं रुद्धभूविदम्।
पवनं संस्मरेद्विश्व जीवनं प्राणरूपत:।।
नदी पर्वत वृक्षादिकालिताग्रास संकुला।
आधारभूता जगतो ध्येया पृथ्वीह मंत्रिणा।।
सूर्यादिग्रह नक्षत्र कालचक्र समन्विताम्।
निर्मलं गगनं ध्यायेत् प्राणिनामाश्रयं पदम।।

माला मंत्र

ॐ ह्रीं नम: कृष्णवाससे शतसहस्त्रहिंसिनि सहस्त्रवदने महाबलेअपराजितो प्रत्यंगिरे परसैन्य परकर्म विध्वंसिनि परमंत्रोत्सादिनि सर्वभूतदमनि सर्वदेवान् वंध बंध सर्वविद्यां छिन्दि छिन्दि क्षोभय क्षोमय परयंत्राणि स्फोटय स्फोटय सर्वश्रृंखलान् त्रोटय त्रोटय ज्वल ज्वालाजिह्वे करालवदने प्रत्यंगिरे ह्रीं नम:।

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अस्य मंत्रस्य ब्रह्मा ऋषि अनुष्टप् छंद: देवीप्रत्यंगिरा देवता ॐ बीजं, ह्रीं शक्तिं, कृत्यानाशने जपे विनियोग:ढ्ढ

ध्यान
सिंहारुढातिकृष्णांगी ज्वालावक्त्रा भयंकरराम।
शूलखड्गकरां वस्त्रे दधतीं नूतने भजे।।
अन्य मंत्र
1-ॐ ह्रीं कृष्णवाससे नारसिंहवदे महाभैरवि ज्वल-ज्वल विद्युज्जवल ज्वालाजिह्वे करालवदने प्रत्यंगिरे क्ष्म्रीं क्ष्म्यैम् नमो नारायणाय घ्रिणु: सूर्यादित्यों सहस्त्रार हुं फट्।

2-ॐ ह्रीं यां कल्ययन्ति नोस्रय: क्रूरां कृत्यां वधूमिव तां ब्रह्मणास्पानिर्नुद्म प्रत्यक्कर्त्तारमिच्छतु ह्रीं ॐ

ध्यान
खड्गचर्मधरां कृष्णाम मुक्तकेशीं विवाससम्।
दंष्ट्राकरालवदनां भीषाभां सर्वभूषणाम्।
ग्रसन्तीं वैरिणं ध्यायेत् प्रेरीतां शिवतेजसा।।

विपरीत प्रत्यंगिरा
शत्रु द्वारा बारम्बार तन्त्र क्रियाओं के किये जाने पर शत्रु यदि रुकने की बजाए और गहरे तन्त्र आघात देने लगें, प्राण हरण पर ही उतर आएँ अर्थात मानव संवेदनाओं की सीमा को लाँघ कर घिनौनी हरकतों पर उतर आएँ तो उसकी क्रिया को उस पर वापस इस तरह से लौटना की शत्रु को आपके दर्द का एहसास हो इसे विपरीत प्रत्यंगिरा कहा जाता है ढ्ढ प्रत्यंगिरा और विपरीत प्रत्यंगिरा में ये भेद है की प्रत्यंगिरा शक्ति तो सिर्फ वापस लौटती है किन्तु विपरीत प्रत्यंगिरा शत्रु को ही वापस चोट पहुंचाती है और खुद की निश्चित रूप से रक्षा करती है। इस प्रयोग के बाद शत्रु आप पर दोबारा यह प्रयोग कभी नहीं कर सकता। उसकी वह शक्ति खत्म हो जाती है।

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ॐ ऐं ह्रीं श्रीं प्रत्यंगिरे मां रक्ष रक्ष मम शत्रून् भंजय भंजय फें हुं फट् स्वाहा।

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अस्य श्री विपरीत प्रत्यंगिरा मंत्रस्य भैरव ऋषि:, अनुष्टुप् छन्द:, श्री विपरीत प्रत्यंगिरा देवता ममाभीष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोग:।

मालामंत्र
ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ कुं कुं कुं मां सां खां पां लां क्षां ॐ ह्रीं ह्रीं ॐ ॐ ह्रीं बां धां मां सां रक्षां कुरु ढ्ढ ॐ ह्रीं ह्रीं ॐ स: हुं ॐ क्षौं वां लां धां मां सा रक्षां कुरु ढ्ढ ॐ ॐ हुं प्लुं रक्षा कुरु ढ्ढ ॐ नमो विपरीतप्रत्यंगिरायै विद्याराज्ञी त्रैलोक्य वंशकरि तुष्टिपुष्टिकरि सर्वपीड़ापहारिणि सर्वापन्नाशिनि सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिनि मोदिनि सर्वशस्त्राणां भेदिनि क्षोभिणि तथा ढ्ढ परमंत्र तंत्र यंत्र विषचूर्ण सर्वप्रयोगादीन् अन्येषां निवर्तयित्वा यत्कृतं तन्मेस्स्तु कपालिनि सर्वहिंसा मा कारयति अनुमोदयति मनसा वाचा कर्मणा ये देवासुर राक्षसास्तिर्यग्योनि सर्वहिंसका विरुपकं कुर्वन्ति मम मंत्र तंत्र यन्त्र विषचूर्ण सर्वप्रयोगादीनात्म हस्तेन।

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